Tuesday, December 17, 2013

गुनाह

गुनाह


हम आके ठहरें  हैं आज 
उस मुक़ाम पर;
हँस लिए तो लगता है
कुछ गुनाह करलिए। 
जीते नहीं हम, सिर्फ़ जिंदा हैं;
ऐसा लगता है सांस लेके
सौ गुनाह करलिए। 



2 comments:

Anonymous said...

Rote huye aate hey sabha..

http://navakarnataka.blogspot.com/2013/12/ison-comet-two-books-introduced-in.html#comment-form

Badarinath Palavalli said...

good one.